अग्रवालों का इतिहास

श्री श्री १००६ श्री महाराजा अग्रसेन जी की चित्रकथा

भविष्य पुराण के लेखक के अनुसार अग्रोहा गणराज्य की स्थापना महाभारत युद्ध के लगभग ५१ वर्ष पूर्व हुई थी | अहिंसा के पुजारी, शांति के दूत महाराज अग्रसेन, प्रतापनगर के महाराजा बल्लभ के जेष्ट पुत्र थे | महाराजा बल्लभ सूर्यवंशी थे | महाराजा अग्रसेन जी का जन्म आज से लगभग ५१८५ वर्ष पूर्व था | महाराजा अग्रसेन द्वारा लगभग ५००० वर्ष पूर्व महाभारत युद्ध के दौरान अग्रोहा गणराज्य पर शासन किया गया था | इसकी पुष्टि अग्रयन गणराज्य के महाराजा गाथा में उद्धत छंद के रूप लिखित दोहा (महाराजा वना पवा -२५५:२०) से होती है | अग्रोहा गणराज्य की स्थापना १८ राज्यों को मिला कर की गई थी | अग्रोहा के निवासी योद्धा व अग्र के नाम से जाने जाते है |

अग्रोहा - दिल्ली से १७६ कि.मी., हिसार (हरियाणा) से २२ कि.मी. राष्ट्रीय मार्ग पर स्थित है | अग्रोहा जाने हेतु विभिन्न सड़क मार्ग नक्शे में दर्शाये गये है |

आज से लगभग ५००० वर्ष पूर्व प्रताप नगर के राजा वल्लब के गर पुत्र उत्पन्न हुआ, राजमहल में बधाई का उत्त्सव मनाया गया | छठी के पुत्र की जन्मपत्री को देखकर ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि बालक वैश्य वंश में श्रेष्ठ, व वैश्यों का उद्धारक होगा | अग्रसेन प्रारम्भ से ही विद्या -बुद्धि में कुशल तथा शस्त्र चलाने में बेजोड़ थे | दोनों भाई प्रताप नगर के किशोरों में बुद्धिमता व कुशल नेतृत्व में प्रसिद्ध हो गये | कुछ समय बाद राजा दशानन की पुत्री से शूरसेन ,और राजा विशाल की पुत्री माधवी से अग्रसेन का विवाह संपन्न हुआ समय आने पर मंत्रियो के परामर्श से राजा वल्लब ने अग्र को राजसिंहासन पर सुशोभित किया ओर स्वयं वानप्रस्त आश्रम के लिए वन में चले गए राजा अग्र ने अपने राज्य को लोगतंत्र के आधार पर चलाया, जिससे उसकी ख्याति दूर - दूर तक फैल गई | देवराज इंद्र को उनकी इस ख्याति से ईर्ष्या हो गई, और राजा अग्र के राज्य में उसने वर्षा बंद करवा दी | राज्य में चारो तरप अकाल पद गया | धन, जन, पशु, सभी पानी के अभाव में तड़प - तड़प मरने लगें |

राजा से प्रजा का यह दुःख नहीं देखा गया, और वह हरिद्वार के पास गंगा किनारे भगवान शिव की उपासना में लग गये - भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उनको आदेश दिया की तुम महालक्ष्मी की आराधना करो | राजा अग्र ने महालक्ष्मी की तपस्या की | राजा की तपस्या और साहस से प्रसन्न होकर देवी महालक्ष्मी प्रगट हुई, और आज्ञा दी कि - तुम कोल्हापुर जाकर नाग राजाओ से अपने सम्बन्ध स्थापित करो, उससे तुम्हारे राज्य और कुल दोनो की वृद्धि होगी | देवी महालक्ष्मी का आदेश पाकर राजा अग्र ने लाव लश्कर सहित कोल्हपुर प्रस्थान किया | कोल्हपुर के राजा, महिरथी की कन्या सुन्द्रावती अत्यंत रूपवती व गुणवती थी | के सुन्द्रावती स्वयम्बर में दूर-दूर से अनेक राजा आये थे | महाराजा अग्रसेन भी वहा उपस्थित थे तपस्या की आभा से उनका
मुख आलोकित था | देवी महालक्ष्मी की प्रेरणा से सुन्दरावती ने स्वयंवर में महाराजा अग्रसेन का वरण किया | वैशाख मास मृगसिरा नक्षत्र के समय राजा अग्रसेन का विवाह नागराजा की कन्या सुन्दरावती के साथ संपन्न हुआ | नागराजा की पुत्री से अग्रसेन का विवाह सुनकर इन्द्र ने नारद जी को बुलाया और कहा कि अग्र के राज में वष्टि न करके मुझसे भूल हुई हैं | कृपया आप अग्र से मेरी संधि करा दें | नारद जी राजा अग्र की सभा में गये और इन्द्र का संधि प्रस्ताव रखा | राजा अग्र नें नारद जी का सत्कार किया और उनकी आज्ञा से इन्द्र से संधि कर ली | अग्रसेन जी की नम्रता और शिष्टता से प्रभावित होकर इंद्र ने स्वयं उनके दरबार में पहुँच कर उन्हें गले से लगा लिया | इन्द्र ने राजा अग्रसेन को मधुशालिनी नाम की अप्सरा भेंट की
और कहा कि तुम यमुना तट पर महालक्ष्मी कि कठोर आराधना करो वही तुम्हारे राज्य संवर्धन का वरदान देंगी | राज्य कि समृद्धि और प्रजा के हित के लिये राजा अग्र ने नौका द्वारा यमुना तट पर जाकर घने जंगल में कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दी | देवी महालक्ष्मी -राजा अग्र की तपस्या से प्रसन्न होकर अपना आलोक बिखेरती हुई प्रकट हुईं , और बोलीं | राजन तुम इस कठिन व्रत को बंद करो | तुम अपने राज्य में वापस जाओ मैं तुम्हें समस्त वैभव एवं सिद्धि प्रदान करुँगी | आज से यह पृथ्वी तेरे वंश से प्रेरित होगी | आज से यह कुल तेरे नाम से जाना जायेगा | जब तक अग्रवंशियों में महालक्ष्मी की आराधना चलती रहेगी वे हमेशा उन्नति के शिखर पर रहेंगे | देवी महालक्ष्मी का वरदान पाकर राजा अग्र ने अपने राज्य आकर राज्य की समृद्धि के लिये अपना तन-मन-धन सर्वस्व लगा दिया | हरिद्वार के पश्चिम की और जहाँ उन्होंने तपस्या की थी उसके निकट ही - एग्रोक नगरी की स्थापना की | बड़े बड़े महल, सुन्दर गलियों, चौबारे, चौड़ी सडकों, मंदिर, जलाशय, बावड़ी, कुंओ आदि से अपने नगर को परिपूर्ण किया, नगर के बीच देवी महालक्ष्मी का एक भव्य मंदिर बनवाया जहाँ अहर्निश पूजा-अर्चना की उचित व्यवस्था थी | राजा अग्र ने अपने राज्य का विस्तार १८ गणराज्यों में किया जहाँ लोकतान्त्रिक राज व्यवस्था से शासन चलाया प्रजा ही राज्य में सर्वोपरि होती थी | सर्वत्र सुख शांति थी | राज्य की प्रतिष्ठा के लिये महाराजा अग्रसेन ने १८ यज्ञ किये | पर यज्ञ के अंत में होने वाली पशुबलि से उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ | तीव्र वेदना के कारण महराजा ने अपने राज्य में राज आज्ञा द्वारा पशुबलि बंद करा दी शुद्ध शाकाहारी भोजन ही प्रजा ने अपनी जीवन पद्धति बना ली | महाराजा अग्रसेन ने १८ गोत्रों की स्थापना की और अपने गोत्र को छोड़ कर अन्य गोत्रों में ही विवाह करने का नियम बना कर एक सुसंस्कृत, बुद्धिवादी, एवं वैज्ञानिक स्वस्थ वंश परंपरा की सुदृढ़ नींव डाली|
धारण     मधुकुल    तायल    नांगल    कुच्छल
गोयल    गर्ग    गोयन    मित्तल
जिंदल    सिंघल    बंसल    ऐरण
कंसल    भंदल    तिंगल    मंगल    बिंदल
उनके राज्य में धनी या निर्धन में कोई भेदभाव नहीं था | नगर में जो भी नवागन्तुक आता था, चाहे वो किसी भी वर्ण का हो, उसे प्रत्येक नगरवासी, एक रुपया और एक ईंट भेंट करता था | यह राज्य का नियम था, अतः लेने वाले को कृतज्ञता का बोध नहीं होता था |
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